आजअपने पहले कदम
उठाने पर
चलना सीखने का
सुखद अहसास हुआ...
तभी रस्ते में बिखरी
कुछ टूटे कांच के
टुकड़े दिखे,
इस से पहले
के कुछ समझ पाती
वो उठे कदम
ज़मीं पर
पड़ चुके थे,
और
कुछ किरचों को
तलवों में
घर मिल गया था..
लाल रंग की
दो उभरी बूंदों को देख
मैं ख़ुशी से
झूम उठी...
आख़िर
रंग इतने
पसंद जो थे..
अभी गिरने वाली ही थी,
के माँ
दौड़कर
मेरे पास आयीं
और संभल लिया..
आँखों में
आँसूं लिए
प्यार से पुचकारा
और पूछने लगीं,
बच्चे,
दर्द तो नहीं हो रहा..
मैंने भी
खिलखिलाते हुए पूछा,
इसका मतलब क्या होता है माँ...
bahut acha mam :)
ReplyDeleteइला दी को इतने समय अंतराल के बाद ब्लॉग पर देखकर बहुत खुशी हुई
ReplyDeleteजहां तक इस कविता का सवाल है ये तो बहुत सुंदर और दिल को छु गई है