Wednesday, 29 February 2012

सवालों के जवाबों में सवालों के अंकुर....


सुबह के छः बज रहे हैं,
पर आँखों में नींद ने,
दस्तक ही नहीं दी है..
लगता है आज,
इस नींद के प्यासे ज़ेहन को,
फ़िर से सूखा झेलना होगा..
अब तो ऐसी प्यास की,
आदत है इसे...
लेकिन, आज कुछ अलग है,
ऐसा लगता है,
मानों ज़ेहन पर कुछ बर्फ जमी थी,
जो धीरे धीरे पिघल रही है,
और इसकी अतृप्त प्यास को,
बुझा रही है...
आज खुद को,
हज़ारों सवालों से घिरा हुआ पाया,
और जब जवाब सोचने लगी,
तो कम्बख्त सोच ने,
हज़ारों और सवाल खड़े कर दिए..
मगर रुको,
ये सब सवाल मेरे लिए न होकर,
तुम्हारे लिए हैं..
एक रोज़,
बड़े भाई ने बातों बातों में कहा,
तुम ज्वालामुखी बनती जा रही हो,
चुपचाप सब सुन तो लेती हो,
मगर सवाल नहीं करती,
लगता है एक दिन,
ये सब साथ में दागे जायेंगे...
उस बात को याद कर,
बहुत हंसी हूँ आज मैं..
मेरा यकीन करते हो,
इसलिए मेरी इस बात को मानों,
तुम्हारे लिए उठे ये सवाल,
आज रात की ही देन हैं,
कोई बचा हुआ पुराना हिसाब नहीं...
क्यूंकि कभी किसी ने,
एक सलाह दी थी,
कुछ हिसाबों को,
बिना पूरा किये ही छोड़ दो...

Thursday, 23 February 2012

कितना कुरूप होता है ये डर....

कहीं
परतों में
दबे हुए
डरों ने
फ़िर से
दस्तक
दी है,
अन्दर ही
अन्दर
जो मुझे
खाए जा
रहे हैं..
परतों में
दबे रहने
के बाद तो
जीवाश्म
निकलते हैं,
लेकिन
ये डर,
इनके कभी
जीवाश्म
नहीं बनते..
आप जितनी
मुस्कुराहटों
या आँसुओं
के तले
इन्हें दबाइये
ये सर उठाकर
फ़िर खड़े
हो जायेंगे...
डरो मत!!
मुझसे कह दो,
ये ख़त्म
हो जायेंगे..
पर नहीं
ये ख़त्म
नहीं होते,
ये बार बार
हर बार
अपने होने का
अहसास
कराते हैं..
डरो मत!!
बहादुर बनो...
बहुत कीमत
चुकाई है
इस बहादुरी की..
फ़िर
ये डर क्यूँ!!
शायद
इनका कुछ
क़र्ज़ बाकी
रह गया
मुझपर,
उसी उधार को
वसूलने आये हैं..
सर्दियां
कुछ कम तो
हुई हैं
मगर,
माथे पर उगी
ये पसीने की
बूंदे
आती हुई
गर्मी की
दस्तक तो नहीं!!
नहीं,
ये वो पानी है
जो बहुत पहले
आँखों के कोनों
से निकलकर
माथे पर
जम गया...
मगर,
विद्रोह से तो
डर ख़त्म
होता है!!
लेकिन
कुछ डर
विद्रोह को
कुचल
डालते हैं,
ठीक वैसे ही
जैसे किसी की
आकांक्षाओं ने
मेरी बहादुरी में
हस्तक्षेप किया
और मेरी सोच को
निर्ममता से
कुचल दिया..
मैं
एक अँधेरे कोने
में बैठ
चीखती, चिल्लाती रही
के कोई मुझे
सुन न ले,
अपने डरों को
किसी और पर
ज़ाहिर
जो नहीं करना
चाहती..
पर मेरे
दिल के धड़कने
की आवाज़
इस डर को
और मज़बूत
बना रही है,
लिखते हुए
हाथों की कंपन
और टेढ़ी-मेढ़ी
लिखावट
इसे और विद्रूप
कर रही है..
जिन बड़ी बड़ी
आँखों को
लोग सुन्दर कहते हैं
वो आज
रक्तरंजित हैं,
मानों शरीर का
सारा रक्त
उनमें उतर
आया है...
ये शब्द भी
बेतरतीबी से
पन्नों को
काला कर
रहे हैं,
जैसे आज
अपने आस-पास
मौजूद
सारी चीज़ों को
बदसूरत बनाने पर
आमादा हैं,
और शायद मुझे भी....

Tuesday, 21 February 2012

शोर से शून्यता की ओर मैं...

वो कुलबुलाहट,
कुछ न कर
पाने की कसक,
आज फ़िर से
उठी है
मेरे भीतर,
चंद मिनटों में
फ़िर से
ठहर गया
मेरा समय,
ख़ुद में
ही आज
सिमट
गयी हूँ मैं,
कुछ रोज़ पहले
की ही
बात है,
छिपन-छिपाई
के खेल में ,
देर तक
छिपे रहने
की होड़,
और ढूँढने
वाला
सिर्फ एक,
आज
इस दुनिया से
छिपना चाहती हूँ,
और
नहीं चाहती
के कोई
ढूंढें मुझे,
मुझे
न कल
किसी से
जीतना था,
और
न आज,
बचपन
का वो खेल,
आज मुझे
एक ज़रूरत
लगने लगा है,
सबको शोख़,
चंचल
दिखाई देने वाली
एक लड़की,
आज
अपने भीतर की
मृत चुप्पी से
लड़ रही है,
ये शान्ति
तूफ़ान के
आने के
पहले की है,
या
उसके
गुज़र जाने
के बाद की,
ये तो
समय बताएगा,
लेकिन
आज
एक एक
पल काटना
मुश्किल हो
रहा है,
एक ठूंठ
की तरह
तूफानों में
टूट न जाऊं,
इसलिए
ख़ुद को
जीवंत रखा,
पर भीतर
मृत होकर
आप
जीवित होने का
आवरण
कैसे ओढ़े
रह सकते हैं,
जीवित रहने की
एक और कुंजी,
लड़ते रहो,
पर आज,
लड़ने की
कोई वजह
भी नहीं
दिखाई दे रही,
ठंड से
न सिर्फ मेरे
हाथ-पाँव सुन्न हैं,
लगता है,
मेरी सोच
और भावनाएं भी
सुन्न हो गयी हैं,
शोर से
शुन्यता की ओर,
अकेली ही
चली जा रही हूँ मैं,
रोको मुझे,
मैं जीना चाहती हूँ,
इन कुंठाओं
से बाहर
निकलना
चाहती हूँ,
ख़ुद को
ख़ाली
करना
चाहती हूँ,
हाँ,
मैं रोना चाहती हूँ,
ख़ुद को
पाना चाहती हूँ,
क्यूंकि किसी की
कुछ पाने की चाह में,
मैंने ख़ुद को खो दिया....

Tuesday, 14 February 2012

प्रेम..केवल एक अनुभूति नहीं वरन एक जीवनकाल!!

प्रेम एक ऐसा सफ़र है जिसमे मंज़िल पाने से ज़्यादा मज़ा रास्तों को तय करने में आता है, हमारे उसी सफ़र के कुछ पलों को शब्दों में पिरोने की एक कोशिश...

रिश्तों की ख़ूबसूरती के बारे में सुना तो था,
लेकिन अब जाकर
उससे वाकिफ़ हुई हूँ..
माँ-पापा की बेटी,
भाई की बहन,
दोस्तों के लिए
उनकी दोस्त,
पर तुमने मुझे
कुछ और
ख़ूबसूरत रिश्तों से
मिलवाया...
माँ कहती थीं,
की कभी लड़कियों की तरह भी
शर्मा लिया करो,
अब हैरान होती हूँ,
जब तुम कहते हो
के लड़कियों की तरह
क्यूँ शर्मा रही हो..
नए रिश्तों से मिलना,
कुछ ऐसा करना
जो अब तक न किया हो,
नहीं मैं बदल नहीं रही हूँ,
बस मेरे इन्द्रधनुष को
नए रंग और
आयाम मिल रहे हैं...
संगीत पहले से
ज़्यादा संगीतमय,
ज़िन्दगी पहले से
कहीं ज्यादा
अपनी लगने लगी है,
इतना सब कुछ
एक साथ हो रहा है...
बिलकुल सर्दियों की
बारिशों की तरह,
जैसे कल बारिश हुई और
हवा भी बिलकुल
साफ़ हो गयी थी,
और आज कोहरा हमसे
आँख मिचौली खेल रहा था..
मैं ख़ूबसूरत हूँ या नहीं,
वो तो नहीं जानती,
मगर जब जब
तुम्हारी आँखों में देखा
तो तुम्हें अपनी तरफ
टकटकी लगाये देखता पाया,
और मैंने फ़िर से
शर्मा के आँखें चुरा लीं,
मानो खुद को कोहरे की बादलों में छुपाने की कोशिश कर रही हूँ....

आज कुछ और देर रुकना चाहती थी मैं, थोडा धीमा होना चाहती थी, ठीक वैसे ही जैसे एक अल्हड़ पहाड़ी नदी मैदानों में आकर थम जाती है..

...सफ़र जारी है....

एक अधूरा सफ़र!!

गाड़ी के कांच पर तुम्हारी हथेली की छाप अभी भी बाकी है,
बस वो लकीरें दिखाई नहीं देती,
आज अचानक घर लौटते समय चौराहे पर गाड़ी रुकी,
इससे पहले तुम्हें वहां कभी नहीं देखा था मैंने...
जब तक कुछ समझ पाती,
तुम्हें मेरी तरफ देख मुस्कुराता पाया,
और मैं भी खिलखिलाकर हंस पड़ी,
एक अल्हड़ बेबाक हंसी..
या तो वो तुम्हारा जादू था
या के मेरा उस गाड़ी में अकेला होना,
इस भीड़ भरी दुनिया में
अकेला हो पाना नामुमकिन सा लगता है...
तुम्हारी हथेली पे खिंची वो आड़ी तिरछी लकीरें,
मानो आईने में अपनी हथेली देख रही हूँ...
कहते हैं वहीँ कहीं बीच में तकदीर की लकीर होती है,
जो शायद हम दोनों की ही हथेली में नहीं थी...
हमारी हंसी, लकीर का न होना,
हमारे एक जैसे होने के साक्षी थे,
फ़िर भी कितने अलग थे हम,
या यूं कहूं के इस दुनिया के लिए
हमें अलग ठहराने के लिए पर्याप्त साक्ष्य..
कुछ पलों में कुछ न कहकर भी
एक रिश्ता सा बन गया हमारे बीच,
वहां से बहुत आगे निकल आई हूँ मैं,
फ़िर भी जैसे मेरा कुछ रह गया तुम्हारे पास...
और मेरे पास बची सिर्फ तुम्हारी हथेली की छाप,
जो गाड़ी के कांच से तो मिट जायेगी, पर मेरे मन से नहीं...