Friday, 11 May 2012

एक औरत होने की कहानी, उसी की ज़ुबानी.....


घृणा,
कहने के लिए
एक शब्द,
जिसे बचपन में
हिंदी की परीक्षा में
शब्दार्थ के लिए
याद किये जाने वाले
एक शब्द के तौर पर
जानती थी...
लेकिन अब,
ये एक भावना बन चुकी है,
जो मेरे मन में
उन सब लोगों के प्रति है
जो इंसान को इंसान न समझ
उसके स्त्री और पुरुष होने के आधार पर
व्यवहार का निर्णय लेते हैं..
बचपन से अब तक
ये भावना प्रबल होती गयी,
और अब मेरा विद्रोह
अपने चरम पर है..
वो नासमझी के दिनों में
अपने दोस्त के घर
उसकी माँ को पिटते देखा..
उन छोटी छोटी कोमल भावनाओं को
दरिंदों के हाथों शोषित होते देखा...
माँ के सही होने के बावजूद
घर की शान्ति बनाये रखने के लिए,
पिता की अशांति पर बलि चढ़ते देखा...
उन नन्हे हाथों को
उनके बोझ का मतलब लिखते देखा...
हाँ, मैं सिर्फ देखती ही रही,
क्यूंकि तब कुछ कह पाने की हिम्मत नहीं थी,
और न ही पुरे मायने में सही ग़लत का अंतर पता था...
अब जब पीछे मुड़कर
उस गुज़रे वक़्त को देखती हूँ,
तो नज़र आते हैं एक युद्ध के अवशेष...
वो युद्ध जिसमे आपके औरत होने मात्र पर
आपको जिंदा जला दिया जाता है,
और उस जले के घाव शायद आपके शरीर पर नहीं.
मगर आत्मा पर हमेशा हरे रहते हैं...
मुझे घिन्न आती है उन सब लोगों से,
जिन्होंने औरत को
भोग,
पीटने,
कुचलने,
दबाने और
प्रताड़ित करने की
वास्तु मात्र बना दिया है...
उसके हिस्से के
प्यार,
लाड और
दुलार को
उसकी खाल नोचकर
पूरा कर दिया है...
वो बच्चे
जिन्हें माँ के गर्भ में ही मार दिया जाता है,
वो माँ जो मातृत्व की अनुभूति लिए
अपनी अजन्मी संतान को छिन्न-भिन्न होते देखती है,
दरअसल वो दोनों ही एक साथ मर जाते हैं....
नासमझी से समझ पाते पाते
अब मैं ये सब सोचने मात्र से सिहर जाती हूँ,
क्यूंकि हम में से शायद ही कुछ लडकियां
इतनी सौभाग्यशाली होती हैं,
जिन्हें जीवन में
ऐसी किसी कुरूपता का सामना नहीं करना पड़ता...
जीवन में ऐसे सत्य
मज़बूत ही नहीं
कठोर भी बना देता हैं...
बढ़ती लड़कियों के कपड़ों से लेकर
उनका भविष्य कैसा होगा
ये तक पुरुषों का निर्णय होता है...
मुझे घृणा है उन सब स्त्रियों से भी
जो अपने घर की बेटियों को
उन्ही सब यंत्रणाओं में झोंकती हैं
जिन्हें सारी ज़िन्दगी वो खुद सहती रहीं..
अर्धांगिनी होने के बावजूद
जो दासी बन गयीं...
यहाँ तक की
दोहों और चौपाइयों में भी
उन्हें पशुओं और घृणित के साथ खड़ा कर दिया...
मतलब विद्वानों तक ने
स्त्री के आत्मसम्मान की
धज्जियाँ उड़ाने में
कोई कसर न छोड़ी...
हमेशा बोझ मानी जाने वाली वो
सबसे बड़ा बोझ है
अपनी आत्मा पर
जो अपनी आवाज़ तक नहीं सुन पाती...
घर में अगर कमाने वालों में भी है
तो उसे खर्च करने का अधिकार नहीं....
वो पुरुष जो स्वयं एक गिलास पानी
लेने में भी सक्षम नहीं,
वो घर का मुखिया बन
सब निर्णय तुम पर थोपता जाता है,
और तुम फ़िर चुपचाप सब सहती हो...
अब मेरे लिए मैं ख़ुद बोलूंगी,
नहीं है ज़रूरत मुझे किसी सहारे की
क्यूंकि मेरा विश्वास साथ में हैं, सहारे में नहीं....
चरम पर पहुंचे इस विद्रोह को दिशा मिल चुकी है,
और नासमझी के बादल छंट चुके हैं,
अब समय है बदलाव का,
और जानती हूँ मैं, के हर बदलाव ख़ुद से शुरू होता है.....

1 comment:

  1. इला दीदी हर बार की तरहा ये कविता दिल को छु गई और सोचने पर मजबूर कर गई नारी के हालातो को
    और ये कविता नारी के हालातो पर एक चोट है

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