जीवन में दुःख और सुख के मापदंड हमारे ख़ुद के बनाये हुए होते हैं, संभवतः कोई और उसका आकलन करे ये आपके साथ नाइंसाफी होगी, लेकिन ये आपको तय करना है के सुख के समय में किसी अप्रत्याशित दुःख के आ जाने पर आपका चुनाव क्या होगा..

अभी तुम्हारी उम्र ही कितनी है,
तुमने देखा क्या है..
अक्सर इन जुमलों को सुन,
सिर्फ एक तिरछी मुस्कराहट,
मेरे लबों पर खिंच जाती है..
ठीक वैसे ही जैसे,
वक़्त ने मेरे हाथों पर
बनायीं कुछ लकीरें,
और दुनिया उन्हें,
मेरी तकदीर कहती है..
देखो उसे!!
उसने एक हमले में,
अपने शरीर के कई हिस्से खो दिए,
पर फ़िर भी,
फ़ख्र से अपना सीना ताने,
आगे बढ़ा जा रहा है...
वो लड़की याद है,
सालों पहले जिसके,
माँ-बाप चल बसे..
कैसे भूल सकती हो,
सड़क किनारे कडकडाती सर्दी में,
ठिठुरता वो परिवार,
जिसके पास शायद,
खाने को भी कुछ नहीं था,
फ़िर भी वो किसी मज़ाक पर,
हंस रहे थे...
तुम्हारी कल्पना से परे होते हैं दुःख..
एक वेहशी ने जिस तरह से,
उस औरत की अस्मत को,
मांस की लोथड़ों में खून की तरह,
तितर-बितर कर दिया..
वो सब लोग,
जिन्हें सदियों तक,
दबाया, मसला और कुचला गया...
वो जंग जिनमे कई बेगुनाहों का खून बहा...
वो चीखें, वो दर्द, वो कोलाहल,
जिसे सुन कर भी अनसुना कर दिया गया...
न्याय की उम्मीद में,
जुल्मोसितम की इबादतें लिख दी गयीं..
क्या तुम्हारा दर्द इन सबसे बड़ा है....
क्यूँ तुमने अपने वक़्त को रोका हुआ है...
क्यूँ तुम इस ज़िद पर अड़ी हो...
किसलिए हंसी और वेदना के क्षितिज पर खड़ी हो...
वो क्या है जिसने तुम्हारे लबों को सी दिया है...
अभी तुम्हारी उम्र ही कितनी है,
तुमने देखा क्या है..
फ़िर एक मुस्कराहट और,
बस इतना ही कहा मैंने...
जिसे तुम रुकना समझ रहे हो,
वो सिर्फ एक अर्धविराम है..
दंगों के बाद का एक ज़ख़्मी शहर के,
मरहम लगाने का वक़्त,
न कोई चीख-पुकार,
न कोई हलचल,
बस एक सन्नाटा और बढ़ी हुई धड़कन...
जैसे जन्म से पहले,
अस्पताल के बराम्दे में बैठे,
एक पिता की हालत,
जो उन चीखों के शोर में,
अपनी सांसें रोके,
अपनी संतान को पहली बार,
अपनी बाहों में लेने के,
उत्सव की सोच में चुप होता है...
मेरे जीवन के उत्सव की आहट,
मैंने अपनी सिसकियों में,
भांप ली है...
इसलिए अपने संवाद पर,
लगा दिया है मैंने,
एक अर्धविराम...

अभी तुम्हारी उम्र ही कितनी है,
तुमने देखा क्या है..
अक्सर इन जुमलों को सुन,
सिर्फ एक तिरछी मुस्कराहट,
मेरे लबों पर खिंच जाती है..
ठीक वैसे ही जैसे,
वक़्त ने मेरे हाथों पर
बनायीं कुछ लकीरें,
और दुनिया उन्हें,
मेरी तकदीर कहती है..
देखो उसे!!
उसने एक हमले में,
अपने शरीर के कई हिस्से खो दिए,
पर फ़िर भी,
फ़ख्र से अपना सीना ताने,
आगे बढ़ा जा रहा है...
वो लड़की याद है,
सालों पहले जिसके,
माँ-बाप चल बसे..
कैसे भूल सकती हो,
सड़क किनारे कडकडाती सर्दी में,
ठिठुरता वो परिवार,
जिसके पास शायद,
खाने को भी कुछ नहीं था,
फ़िर भी वो किसी मज़ाक पर,
हंस रहे थे...
तुम्हारी कल्पना से परे होते हैं दुःख..
एक वेहशी ने जिस तरह से,
उस औरत की अस्मत को,
मांस की लोथड़ों में खून की तरह,
तितर-बितर कर दिया..
वो सब लोग,
जिन्हें सदियों तक,
दबाया, मसला और कुचला गया...
वो जंग जिनमे कई बेगुनाहों का खून बहा...
वो चीखें, वो दर्द, वो कोलाहल,
जिसे सुन कर भी अनसुना कर दिया गया...
न्याय की उम्मीद में,
जुल्मोसितम की इबादतें लिख दी गयीं..
क्या तुम्हारा दर्द इन सबसे बड़ा है....
क्यूँ तुमने अपने वक़्त को रोका हुआ है...
क्यूँ तुम इस ज़िद पर अड़ी हो...
किसलिए हंसी और वेदना के क्षितिज पर खड़ी हो...
वो क्या है जिसने तुम्हारे लबों को सी दिया है...
अभी तुम्हारी उम्र ही कितनी है,
तुमने देखा क्या है..
फ़िर एक मुस्कराहट और,
बस इतना ही कहा मैंने...
जिसे तुम रुकना समझ रहे हो,
वो सिर्फ एक अर्धविराम है..
दंगों के बाद का एक ज़ख़्मी शहर के,
मरहम लगाने का वक़्त,
न कोई चीख-पुकार,
न कोई हलचल,
बस एक सन्नाटा और बढ़ी हुई धड़कन...
जैसे जन्म से पहले,
अस्पताल के बराम्दे में बैठे,
एक पिता की हालत,
जो उन चीखों के शोर में,
अपनी सांसें रोके,
अपनी संतान को पहली बार,
अपनी बाहों में लेने के,
उत्सव की सोच में चुप होता है...
मेरे जीवन के उत्सव की आहट,
मैंने अपनी सिसकियों में,
भांप ली है...
इसलिए अपने संवाद पर,
लगा दिया है मैंने,
एक अर्धविराम...
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