सुबह के छः बज रहे हैं,पर आँखों में नींद ने,
दस्तक ही नहीं दी है..
लगता है आज,
इस नींद के प्यासे ज़ेहन को,
फ़िर से सूखा झेलना होगा..
अब तो ऐसी प्यास की,
आदत है इसे...
लेकिन, आज कुछ अलग है,
ऐसा लगता है,
मानों ज़ेहन पर कुछ बर्फ जमी थी,
जो धीरे धीरे पिघल रही है,
और इसकी अतृप्त प्यास को,
बुझा रही है...
आज खुद को,
हज़ारों सवालों से घिरा हुआ पाया,
और जब जवाब सोचने लगी,
तो कम्बख्त सोच ने,
हज़ारों और सवाल खड़े कर दिए..
मगर रुको,
ये सब सवाल मेरे लिए न होकर,
तुम्हारे लिए हैं..
एक रोज़,
बड़े भाई ने बातों बातों में कहा,
तुम ज्वालामुखी बनती जा रही हो,
चुपचाप सब सुन तो लेती हो,
मगर सवाल नहीं करती,
लगता है एक दिन,
ये सब साथ में दागे जायेंगे...
उस बात को याद कर,
बहुत हंसी हूँ आज मैं..
मेरा यकीन करते हो,
इसलिए मेरी इस बात को मानों,
तुम्हारे लिए उठे ये सवाल,
आज रात की ही देन हैं,
कोई बचा हुआ पुराना हिसाब नहीं...
क्यूंकि कभी किसी ने,
एक सलाह दी थी,
कुछ हिसाबों को,
बिना पूरा किये ही छोड़ दो...
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