Tuesday, 6 March 2012

लाल रंग से ओत-प्रोत जीवन...

सुर्ख़ लाल रंग,
मुझे हमेशा से पसंद आया,
पहली दफा शायद,
माँ के माथे पर,
कुमकुम की बिंदी के रूप में,
इस रंग से वाकिफ़ हुई..
बढ़ती उम्र के साथ,
इसके असल मायने समझ आये...
एक सुहागन के माथे का लाल सिन्दूर,
नई दुल्हन की लाल साड़ी,
माँ के हाथे में वो सादा,
कांच की लाल चूड़ियाँ,
मुझे ये सब बहुत भाते थे....
और मैं ख़ुद को,
इन सब लाल रंगों में,
सराबोर होने की कल्पना मात्र से,
आत्मविभोर हो जाती..
लेकिन कल्पनाओं और वास्तविकता
के बीच के उस पुल को,
पार करते हुए,
लाल रंग के वीभत्स रूप से,
मेरा आमना-सामना हुआ....
छुटपन की शैतानियों में,
छिले घुटनों से निकली,
उसी लाल रंग की,
कुछ महीन बूँदें,
शायद नज़रंदाज़ हो गयीं...
क्यूंकि जब पहली दफा,
सड़क पर बिखरे,
ग़र्म लाल खून को,
सूख कर काला होते देखा,
तो कलेजा मुँह को आ गया...
उसके बाद न जाने,
कितने दिन और कितनी ही रातें,
उस लाल और काले रंग के,
दुस्वप्नों में बीतीं....
पर ये इंसानी दिमाग,
बहुत कमाल की मशीन है,
हर बात के मायने,
अपनी सुविधानूसार निर्धारित कर लेती है...
तभी तो न जाने,
फ़िर कितनी बार इन आँखों ने,
खून को बहने से लेकर,
जम जाने तक और फ़िर,
उसके धब्बों को मिटते देखा,
लेकिन इस बार न कोई शिकन,
और न ही कोई बुरा सपना...
लाल रंग से मेरा मोहभंग,
इतने के बाद भी न हुआ...
जबकि कई माँगों को मैंने,
सिन्दूरी से सुनी होते देखा...
नयी दुल्हन की वो चटख लाल साड़ी,
अनायास सफ़ेद में तब्दील हो गयी...
कुछ टूटी लाल चूड़ियों की किरचें,
इधर-उधर बिखरी देखीं..
अपनी सोच के मकड़जाल में,
मैं ऐसा उलझी की,
लाल रंग की कुरूपता को,
देख कर भी,
अनदेखा करती रही..
फ़िर एक दिन जैसे,
पौ फ़टने पर लालिमा से भरा सूर्य दिखा,
और इस बार बारी थी,
मेरे विचारों में लालिमा छाने की...
अचानक ही सुन्दरता और कुरूपता के,
सारे अंतर पट गए...
अब मेरे लिए सब लाल था..
दुःख लाल, सूख लाल..
मातम लाल, उत्सव लाल...
ताकत लाल, कलम लाल...
क्रान्ति लाल, प्रेम लाल....
और इन सबसे कहीं ज्यादा,
मेरा जीवन हुआ सुर्ख लाल....

1 comment:

  1. क्या खूब लिखा है इला दीदी ने

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