वो कुलबुलाहट,
कुछ न कर
पाने की कसक,
आज फ़िर से
आज फ़िर से
उठी है
मेरे भीतर,
चंद मिनटों में
चंद मिनटों में
फ़िर से
ठहर गया
मेरा समय,
ख़ुद में
ख़ुद में
ही आज
सिमट
गयी हूँ मैं,
कुछ रोज़ पहले
कुछ रोज़ पहले
की ही
बात है,
छिपन-छिपाई
छिपन-छिपाई
के खेल में ,
देर तक
देर तक
छिपे रहने
की होड़,
और ढूँढने
और ढूँढने
वाला
सिर्फ एक,
आज
आज
इस दुनिया से
छिपना चाहती हूँ,
और
और
नहीं चाहती
के कोई
ढूंढें मुझे,
मुझे
मुझे
न कल
किसी से
जीतना था,
और
और
न आज,
बचपन
बचपन
का वो खेल,
आज मुझे
आज मुझे
एक ज़रूरत
लगने लगा है,
सबको शोख़,
सबको शोख़,
चंचल
दिखाई देने वाली
दिखाई देने वाली
एक लड़की,
आज
आज
अपने भीतर की
मृत चुप्पी से
लड़ रही है,
ये शान्ति
ये शान्ति
तूफ़ान के
आने के
पहले की है,
या
या
उसके
गुज़र जाने
के बाद की,
ये तो
ये तो
समय बताएगा,
लेकिन
लेकिन
आज
एक एक
एक एक
पल काटना
मुश्किल हो
रहा है,
एक ठूंठ
एक ठूंठ
की तरह
तूफानों में
टूट न जाऊं,
इसलिए
इसलिए
ख़ुद को
जीवंत रखा,
पर भीतर
पर भीतर
मृत होकर
आप
आप
जीवित होने का
आवरण
कैसे ओढ़े
रह सकते हैं,
जीवित रहने की
जीवित रहने की
एक और कुंजी,
लड़ते रहो,
पर आज,
लड़ने की
लड़ते रहो,
पर आज,
लड़ने की
कोई वजह
भी नहीं
दिखाई दे रही,
ठंड से
ठंड से
न सिर्फ मेरे
हाथ-पाँव सुन्न हैं,
लगता है,
मेरी सोच
लगता है,
मेरी सोच
और भावनाएं भी
सुन्न हो गयी हैं,
शोर से
शोर से
शुन्यता की ओर,
अकेली ही
अकेली ही
चली जा रही हूँ मैं,
रोको मुझे,
मैं जीना चाहती हूँ,
इन कुंठाओं
रोको मुझे,
मैं जीना चाहती हूँ,
इन कुंठाओं
से बाहर
निकलना
चाहती हूँ,
ख़ुद को
ख़ुद को
ख़ाली
करना
चाहती हूँ,
हाँ,
हाँ,
मैं रोना चाहती हूँ,
ख़ुद को
ख़ुद को
पाना चाहती हूँ,
क्यूंकि किसी की
क्यूंकि किसी की
कुछ पाने की चाह में,
मैंने ख़ुद को खो दिया....
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