एक अधूरा सफ़र!!
गाड़ी के कांच पर तुम्हारी हथेली की छाप अभी भी बाकी है,
बस वो लकीरें दिखाई नहीं देती,
आज अचानक घर लौटते समय चौराहे पर गाड़ी रुकी,
इससे पहले तुम्हें वहां कभी नहीं देखा था मैंने...
जब तक कुछ समझ पाती,
तुम्हें मेरी तरफ देख मुस्कुराता पाया,
और मैं भी खिलखिलाकर हंस पड़ी,
एक अल्हड़ बेबाक हंसी..
या तो वो तुम्हारा जादू था
या के मेरा उस गाड़ी में अकेला होना,
इस भीड़ भरी दुनिया में
अकेला हो पाना नामुमकिन सा लगता है...
तुम्हारी हथेली पे खिंची वो आड़ी तिरछी लकीरें,
मानो आईने में अपनी हथेली देख रही हूँ...
कहते हैं वहीँ कहीं बीच में तकदीर की लकीर होती है,
जो शायद हम दोनों की ही हथेली में नहीं थी...
हमारी हंसी, लकीर का न होना,
हमारे एक जैसे होने के साक्षी थे,
फ़िर भी कितने अलग थे हम,
या यूं कहूं के इस दुनिया के लिए
हमें अलग ठहराने के लिए पर्याप्त साक्ष्य..
कुछ पलों में कुछ न कहकर भी
एक रिश्ता सा बन गया हमारे बीच,
वहां से बहुत आगे निकल आई हूँ मैं,
फ़िर भी जैसे मेरा कुछ रह गया तुम्हारे पास...
और मेरे पास बची सिर्फ तुम्हारी हथेली की छाप,
जो गाड़ी के कांच से तो मिट जायेगी, पर मेरे मन से नहीं...
कविता तो अच्छी है ही...उससे अच्छी ये शुरुआत है...ब्लॉग लेखन शुरु करने के लिए बधाई...
ReplyDeleteब्लाग लेखन के लिये शुक्रिया इला जी. आशा है इसी तरह आपकी पोस्ट पढ़ने को मिलती रहेंगी. :)
ReplyDeleteSuperb....
ReplyDeleteI am loving it :)
ReplyDeleteBehad umda shuruat...bahut khoob likha hai...aise hi likhti raho...Best Wishes :)
ReplyDeleteAwesome...Congratulations dear! Keep it Up
ReplyDeleteBrillliant Ila...All the best and Congrats!
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