प्रेम एक ऐसा सफ़र है जिसमे मंज़िल पाने से ज़्यादा मज़ा रास्तों को तय करने में आता है, हमारे उसी सफ़र के कुछ पलों को शब्दों में पिरोने की एक कोशिश...
रिश्तों की ख़ूबसूरती के बारे में सुना तो था,
लेकिन अब जाकर
उससे वाकिफ़ हुई हूँ..
माँ-पापा की बेटी,
भाई की बहन,
दोस्तों के लिए
उनकी दोस्त,
पर तुमने मुझे
कुछ और
ख़ूबसूरत रिश्तों से
मिलवाया...
माँ कहती थीं,
की कभी लड़कियों की तरह भी
शर्मा लिया करो,
अब हैरान होती हूँ,
जब तुम कहते हो
के लड़कियों की तरह
क्यूँ शर्मा रही हो..
नए रिश्तों से मिलना,
कुछ ऐसा करना
जो अब तक न किया हो,
नहीं मैं बदल नहीं रही हूँ,
बस मेरे इन्द्रधनुष को
नए रंग और
आयाम मिल रहे हैं...
संगीत पहले से
ज़्यादा संगीतमय,
ज़िन्दगी पहले से
कहीं ज्यादा
अपनी लगने लगी है,
इतना सब कुछ
एक साथ हो रहा है...
बिलकुल सर्दियों की
बारिशों की तरह,
जैसे कल बारिश हुई और
हवा भी बिलकुल
साफ़ हो गयी थी,
और आज कोहरा हमसे
आँख मिचौली खेल रहा था..
मैं ख़ूबसूरत हूँ या नहीं,
वो तो नहीं जानती,
मगर जब जब
तुम्हारी आँखों में देखा
तो तुम्हें अपनी तरफ
टकटकी लगाये देखता पाया,
और मैंने फ़िर से
शर्मा के आँखें चुरा लीं,
मानो खुद को कोहरे की बादलों में छुपाने की कोशिश कर रही हूँ....
आज कुछ और देर रुकना चाहती थी मैं, थोडा धीमा होना चाहती थी, ठीक वैसे ही जैसे एक अल्हड़ पहाड़ी नदी मैदानों में आकर थम जाती है..
...सफ़र जारी है....
रिश्तों की ख़ूबसूरती के बारे में सुना तो था,
लेकिन अब जाकर
उससे वाकिफ़ हुई हूँ..
माँ-पापा की बेटी,
भाई की बहन,
दोस्तों के लिए
उनकी दोस्त,
पर तुमने मुझे
कुछ और
ख़ूबसूरत रिश्तों से
मिलवाया...
माँ कहती थीं,
की कभी लड़कियों की तरह भी
शर्मा लिया करो,
अब हैरान होती हूँ,
जब तुम कहते हो
के लड़कियों की तरह
क्यूँ शर्मा रही हो..
नए रिश्तों से मिलना,
कुछ ऐसा करना
जो अब तक न किया हो,
नहीं मैं बदल नहीं रही हूँ,
बस मेरे इन्द्रधनुष को
नए रंग और
आयाम मिल रहे हैं...
संगीत पहले से
ज़्यादा संगीतमय,
ज़िन्दगी पहले से
कहीं ज्यादा
अपनी लगने लगी है,
इतना सब कुछ
एक साथ हो रहा है...
बिलकुल सर्दियों की
बारिशों की तरह,
जैसे कल बारिश हुई और
हवा भी बिलकुल
साफ़ हो गयी थी,
और आज कोहरा हमसे
आँख मिचौली खेल रहा था..
मैं ख़ूबसूरत हूँ या नहीं,
वो तो नहीं जानती,
मगर जब जब
तुम्हारी आँखों में देखा
तो तुम्हें अपनी तरफ
टकटकी लगाये देखता पाया,
और मैंने फ़िर से
शर्मा के आँखें चुरा लीं,
मानो खुद को कोहरे की बादलों में छुपाने की कोशिश कर रही हूँ....
आज कुछ और देर रुकना चाहती थी मैं, थोडा धीमा होना चाहती थी, ठीक वैसे ही जैसे एक अल्हड़ पहाड़ी नदी मैदानों में आकर थम जाती है..
...सफ़र जारी है....
beautifull :)
ReplyDeleteप्रेम ना बाड़ी उपजै प्रेम ना हाट बिकाय....प्रेम के बारे में शायद ये लाइने बिल्कुल सच साबित होती हैं...वरन ये तो सिर्फ महसूस करने की चीज है... ये ना जाने कब कहां और किससे हो जाए कुछ पता नहीं.... आपकी पोस्ट उम्दा लगी...ये सफर जारी यूंही जारी रखें....विवेक वाजपेयी
ReplyDeletegr8 :)
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