कहीं
परतों में
दबे हुए
डरों ने
फ़िर से
दस्तक
दी है,
अन्दर ही
अन्दर
जो मुझे
खाए जा
रहे हैं..
परतों में
दबे रहने
के बाद तो
जीवाश्म
निकलते हैं,
लेकिन
ये डर,
इनके कभी
जीवाश्म
नहीं बनते..
आप जितनी
मुस्कुराहटों
या आँसुओं
के तले
इन्हें दबाइये
ये सर उठाकर
फ़िर खड़े
हो जायेंगे...
डरो मत!!
मुझसे कह दो,
ये ख़त्म
हो जायेंगे..
पर नहीं
ये ख़त्म
नहीं होते,
ये बार बार
हर बार
अपने होने का
अहसास
कराते हैं..
डरो मत!!
बहादुर बनो...
बहुत कीमत
चुकाई है
इस बहादुरी की..
फ़िर
ये डर क्यूँ!!
शायद
इनका कुछ
क़र्ज़ बाकी
रह गया
मुझपर,
उसी उधार को
वसूलने आये हैं..
सर्दियां
कुछ कम तो
हुई हैं
मगर,
माथे पर उगी
ये पसीने की
बूंदे
आती हुई
गर्मी की
दस्तक तो नहीं!!
नहीं,
ये वो पानी है
जो बहुत पहले
आँखों के कोनों
से निकलकर
माथे पर
जम गया...
मगर,
विद्रोह से तो
डर ख़त्म
होता है!!
लेकिन
कुछ डर
विद्रोह को
कुचल
डालते हैं,
ठीक वैसे ही
जैसे किसी की
आकांक्षाओं ने
मेरी बहादुरी में
हस्तक्षेप किया
और मेरी सोच को
निर्ममता से
कुचल दिया..
मैं
एक अँधेरे कोने
में बैठ
चीखती, चिल्लाती रही
के कोई मुझे
सुन न ले,
अपने डरों को
किसी और पर
ज़ाहिर
जो नहीं करना
चाहती..
पर मेरे
दिल के धड़कने
की आवाज़
इस डर को
और मज़बूत
बना रही है,
लिखते हुए
हाथों की कंपन
और टेढ़ी-मेढ़ी
लिखावट
इसे और विद्रूप
कर रही है..
जिन बड़ी बड़ी
आँखों को
लोग सुन्दर कहते हैं
वो आज
रक्तरंजित हैं,
मानों शरीर का
सारा रक्त
उनमें उतर
आया है...
ये शब्द भी
बेतरतीबी से
पन्नों को
काला कर
रहे हैं,
जैसे आज
अपने आस-पास
मौजूद
सारी चीज़ों को
बदसूरत बनाने पर
आमादा हैं,
और शायद मुझे भी....
परतों में
दबे हुए
डरों ने
फ़िर से
दस्तक
दी है,
अन्दर ही
अन्दर
जो मुझे
खाए जा
रहे हैं..
परतों में
दबे रहने
के बाद तो
जीवाश्म
निकलते हैं,
लेकिन
ये डर,
इनके कभी
जीवाश्म
नहीं बनते..
आप जितनी
मुस्कुराहटों
या आँसुओं
के तले
इन्हें दबाइये
ये सर उठाकर
फ़िर खड़े
हो जायेंगे...
डरो मत!!
मुझसे कह दो,
ये ख़त्म
हो जायेंगे..
पर नहीं
ये ख़त्म
नहीं होते,
ये बार बार
हर बार
अपने होने का
अहसास
कराते हैं..
डरो मत!!
बहादुर बनो...
बहुत कीमत
चुकाई है
इस बहादुरी की..
फ़िर
ये डर क्यूँ!!
शायद
इनका कुछ
क़र्ज़ बाकी
रह गया
मुझपर,
उसी उधार को
वसूलने आये हैं..
सर्दियां
कुछ कम तो
हुई हैं
मगर,
माथे पर उगी
ये पसीने की
बूंदे
आती हुई
गर्मी की
दस्तक तो नहीं!!
नहीं,
ये वो पानी है
जो बहुत पहले
आँखों के कोनों
से निकलकर
माथे पर
जम गया...
मगर,
विद्रोह से तो
डर ख़त्म
होता है!!
लेकिन
कुछ डर
विद्रोह को
कुचल
डालते हैं,
ठीक वैसे ही
जैसे किसी की
आकांक्षाओं ने
मेरी बहादुरी में
हस्तक्षेप किया
और मेरी सोच को
निर्ममता से
कुचल दिया..
मैं
एक अँधेरे कोने
में बैठ
चीखती, चिल्लाती रही
के कोई मुझे
सुन न ले,
अपने डरों को
किसी और पर
ज़ाहिर
जो नहीं करना
चाहती..
पर मेरे
दिल के धड़कने
की आवाज़
इस डर को
और मज़बूत
बना रही है,
लिखते हुए
हाथों की कंपन
और टेढ़ी-मेढ़ी
लिखावट
इसे और विद्रूप
कर रही है..
जिन बड़ी बड़ी
आँखों को
लोग सुन्दर कहते हैं
वो आज
रक्तरंजित हैं,
मानों शरीर का
सारा रक्त
उनमें उतर
आया है...
ये शब्द भी
बेतरतीबी से
पन्नों को
काला कर
रहे हैं,
जैसे आज
अपने आस-पास
मौजूद
सारी चीज़ों को
बदसूरत बनाने पर
आमादा हैं,
और शायद मुझे भी....

इसी लिए
ReplyDeleteशायद इसीलिए
तुम्हें डरना नहीं है
क्योंकि
तुम चेहरे और आंखों
से
कहीं आगे
सुंदर हो
मन से भी
और डर बनाएगा
कुरुप
मन को भी
थाम देगा
जीवन को भी
और
इसीलिए
चाहता हूं मैं
तुमको...
और ये
कि न डरो तुम
किसी से भी
अवसाद से उपजा डर
ReplyDeleteऔर डर से मिलने वाला अवसाद
दोनों हृदय से होकर
मस्तिष्क में घुस जाते हैं
इसलिए इसी लिए
ह्रदय को मज़बूत करो
अवसाद मत पनपने दो
क्योंकि यह ही
वह कीड़ा है जो
तुम्हे अन्दर से खा जाएगा
तुमको खबर होने तक
और तुम डरते जाने के अलावा
कुछ ना कर पाओगी
ना रोक पाओगी
किसी भी अजनबी को
या किसी भी अवस्था को
डरावनी शक्ल लेने से ....
मार सको तो मार दो
इस अवसाद और उस से
उपजे डर को अपने अन्दर ही
वैसे ही जैसे आज तक
इच्छाएं मारती आई हो
इच्छाओं को बाहर आने दो
उनके साकार होने पर
वह तुम्हारा साथ देंगी
इस डर से लड़ने में
तुम्हारी सहायता करेंगी
मन को मारने से अच्छा है
डर को मार डालो!!!!